सिया गोयल और केतन अग्रवाल की शादी फरवरी में तय हुई थी और नवंबर 2026 में शादी होना तय हुआ था , सिया गोयल के पिता प्रवीण गोयल का करोड़ों का ड्राई फ्रूटस का व्यापार है ! सिया की भी बेकरी शॉप थी, सिया की बेकरी शॉप के पास ही चेतन चौधरी की ग्रोसरी शॉप थी और यही कारण था कि सिया और चेतन का दोस्ती परवान चढ़ी ? 20 वर्ष की सिया और उसके यार चेतन के बीच 26 वर्षीय केतन आ गया था ! केतन अग्रवाल ने अमेरिका से पढाई की थी। केतन उच्च शिक्षित युवा था, उद्धमी था, गंभीर प्रकृति का था, दूसरी तरफ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सिया गोयल तो 12वीं कक्षा भी उत्तीर्ण नहीं थी ! सिया गोयल लक्जरी लाइफ जीने की आदी थी, शराब, दोस्ती, पार्टी उसकी लाइफ रूटीन में शामिल थे !
ये वैश्य ( व्यापारी ) याने बनिया जो होते हैं ना, ये कर्तव्य, पैसा , ओहदा, संपत्ति को और समाज में इज्जत को बड़ा महत्व देते हैं, अधिकांश मध्यम और उच्च मध्यमवर्गीय हिंदुस्तानी संस्कारी परिवार , परंपराओं, संस्कारों , रूढ़िवादिता, धारणाओं और धार्मिक पाखंड में जीते हैं , राजश्री प्रोडक्शन की फिल्मों में दिखाये गये काल्पनिक फिल्मी परिवारों की तरह जीना इनकी चाहत होती है, हमारे कथित संस्कारी परिवारों ने देवताओं का पूरा कुनबा तो गृहस्थी में ही इकठ्ठा कर लिया होता है ! उनके नन्हे – मुन्ने बाल गोपाल होते हैं ! पत्नि साक्षात देवी होती है, पति परमेश्वर है ! माँ – बाप तो भगवान होते ही हैं ! अब इनको अध्यात्म की जरूरत क्या है ? जब घर के अंदर ही देवताओं का पूरा खानदान इकठ्ठा रखा होता है !?
अब ये क्या करेंगे गीता जान के ? ये क्या करेंगे बोध, ज्ञान और समझ से जी के ? जैसे इनके पुरखे जीते थे, वैसे ही ये भी जी रहे हैं और ये सोचते हैं कि भविष्य में इनके बच्चे भी वैसे ही जियेंगे ? अमेरिका से पढ़ के आ के बच्चे को बैठना तो गल्ले पर ही है और बस गल्ले पर बैठते ही मां – बाप – ताऊ शादी के पीछे लग जायेंगे ? और फिर बच्चे ( पोते ) करने के लिये पीछे लग जायेंगे ? इनका सारा ज्ञान तो सूरज बड़जात्या की फ़िल्मों से ही आता है ! इन तथाकथित संस्कारी परिवारों में भले ही सर फ़ुटव्वल चल रही हो, भले ही ताऊ – चाचा – पापा में संपत्ति को ले के झगड़े चल रहे हों लेकिन दिवाली या त्योहारों या शादियों में ये संस्कारी लोग, नकली सुख और आनंद का ऐसा प्रदर्शन करते हैं, ऐसा रूप बदलते है कि ‘ भस्मासुर ‘ भी शर्मा जाये ?
आज की पीढी ZEN Z कहलाती है , वर्ष 2000 के बाद पैदा हुए बच्चे इसी ZEN Z में शामिल हैं, इनको 100 तरह के स्त्रोतों से सूचनाएं और जानकारी मिल रही होती है, वेबसिरीज, सीरियल्स, टी वी शोज़ और फिल्मों के ये दीवाने हैं, जैसा देखते – सुनते हैं वैसा ही उन्मुक्त और स्वछंद जीवन जीना इनकी चाहत होती है जहां कोई बंधन ना हो, बेड़ियाँ ना हों , कर्तव्य के नाम पर गुलामी ना हो ? सिया की उम्र ही क्या है ? 20 साल की उम्र में क्या कोई परिवार की जिम्मेदारी सम्हाल सकता हैं ? क्या किसी से प्रेम कर सकता है ? वैसे देखा जाये तो क्या इनके परिवारों में प्रेम होता है क्या ? सिया को प्रेम, करुणा का कुछ आभास भी होगा ? फिल्मों में भी हिंसा देखते हैं, घर में भी नफरतें और षड्यंत्र चलते रहते हैं ? तो सिया ने भी वही सीखा … घृणा, द्वेष और हिंसा !
विशेषतः मध्यमवर्गीय परिवारों में लड़की जवान हुई नहीं कि उसको ‘ निपटाने ‘ की तैयारी होने लगती है, लड़का अपने धर्म का हो, अपनी जाति का हो, कमाता हो, पेतृक संपत्ति हो , परिवार की समाज में इज्जत हो ? बस और क्या चाहिए ? करोड़ों रुपए शादी में फूंक दो और लड़की को गुलामी करने के लिये फेंक दो ? इस पूरी शादी की नौटंकी में ‘ प्रेम ‘ कहाँ है ? सिया निश्चित ही अपनी मां की मजबूरियों जो बचपन से देख ही रही होगी, माँ की बेचैनी, लाचारी और बेबसी को उसने महसूस किया होगा और वो उसी गृहस्थी के मकड़ जाल में नहीं फसना चाहती होगी ? लेकिन उसके अपरिपक्व दिमाग में इस जंजाल से निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा होगा तो उसने केतन को ही पहाड़ से गिराने का बहुत गलत फैसला लिया ? एक मासूम होनहार लड़के को मार डाला, उसके मां – बाप को जीवन पर्यंत के लिये अथाह दुख में धकेल दिया !
गोयल परिवार ने अपनी बच्ची का नाम ‘ देवी सीता ‘ के नाम पर इसलिए रखा होगा कि उनकी बेटी भी देवी सीता की तरह ही सरलता, सुंदरता , धैर्य और सद्गुणों से युक्त होगी लेकिन सिया नाम रखने से पहले गोयल साहब को भी राजा जनक होना होगा, माँ को रानी सुनयना होना होगा ! हुआ क्या ? ना वो जनक बन पाये ना ‘ सिया ‘ ही देवी सीता ? देवी सीता को भी स्वयंवर ( अपना पति स्वयं चुनना ) का अधिकार मिला था तभी तो देवी सीता को राम मिले थे ? फिर आज हजारों साल बाद भी लड़कियों पर जबरदस्ती शादी क्यों थोपी जा रही है ?
सिया की गलती ये है कि उसने केतन को खाई में फेंका, असल में सिया को सड़ी – गली परंपराओं को खाई में फेंकना था, धारणाओं को फेंकना था, मान्यताओं को फेंकना था, अप्रेम को फेंकना था , अंधविश्वास, कुरुतियों, धार्मिक पाखंड, झूठी संस्कृति और जाति – धर्म को लोहगढ़ किले की पहाड़ी से स्याह खाई में हमेशा के लिये दफन देना चाहिए था !
नमस्कार
राजेंद्र सोनी
संपादक, लेखक, चिंतक
मुक्ति की उड़ान पत्रिका
भोपाल
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